Wednesday, December 7

यूरिक एसिड कम कर गठिया से बचें

यूरिक एसिड कम कर गठिया से बचें


30 वर्ष की उम्र के बाद अक्सर लोगों को गठिया और उसमें दर्द व सूजन की शिकायत होने लगती है। और गलत खानपान से यह तकलीफ बढ़ भी सकती है। इन सब से शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढऩे पर भी इस तरह की समस्याओं में इजाफा होता है।

हाई फाइबर फूड का सेवन करें

  •  विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन यूरिक एसिड कम करने में बेहद मददगार साबित होगा। इसके साथ ही चेरी, ब्लू बेरी जैसे फलों जूस, शरीर में बढ़े हुए यूरिक एसिड के स्तर को कम करने में मददगार है।
  • हाई फाइबर फूड का सेवन भी बढ़े हुए यूरिक एसिड को कम करने में सहायक है। यह यूरिक एसिड को सोखने में मददगार है। इसके अलावा अंगूर के बीजों का प्रयोग कई बीमारियों की दवाओं में किया जाता है।
  •  हरा धनिया एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है और एक तरह से डाइयूरेटिक की तरह काम करता है। इसका व इसके जूस का भरपूर सेवन करना गठिया और अन्य तकलीफों से निजात दिलाएगा।
  •  एपल साइडर विनेगर यानि सेब का सिरका, पानी के साथ मिलाकर लेना भी फासदेमंद है। डॉक्टर्स भी यूरिक एसिड का स्तर कम करने के लिए कुछ दवाएं देते हैं, जो आपकी सेहत और शरीर की प्रकृति के अनुसार दी जाती हैं। डॉक्टर की मदद लेना एक बेहतर उपाय साबित होगा।
  •  फैटी चीजें और अधिक मीठे खान-पान एवं पेय पदार्थों का सेवन यूरिक एसिड के स्तर को कम करने में बाधा पैदा कर सकता है। यूरिक एसिड बढऩे पर शराब और इन चीजों का सेवन न करें।

ब्लड टेस्ट से हो सकेगी फेफड़ों के कैंसर की पहचान
अक्सर फेफड़ों के कैंसर के बारे में अगर शुरुआती अवस्था में बचा लग जाए तो रोगी को आसानी से बचाया जा सकता है। हाल ही में हुए शोध में पाया गया है कि अब ब्लड टेस्ट के जरिए इसका पता लगाना आसान हो जाएगा।  वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में पाया है कि फेफड़े के कैंसर से पीडि़त लोगों के खून में एक खास तरह के प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। यह खोज सामने आने के बाद इस बीमारी की जांच के लिए साधारण सा ब्लड टेस्ट विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।  शोधकर्ताओं ने पाया कि फेफड़ों के कैंसर से ग्रसित लोगों में आईसोसिट्रेट डी हाइड्रोजिनेज (आइडीएचआई) प्रोटीन काफी उच्च मात्र में पाया जाता है। प्रमुख शोधकर्ता ने कहा कि यह पहला शोध है जिसने आइडीएचआई की पहचान की है। इस बीमारी का पता काफी देर से चल पाता है। यही वजह से कि दुनियाभर में तेजी से फैल रही इस बीमारी की मृत्युदर अभी काफी ज्यादा है। 2007 से 2011 के बीच 943 मरीजों के रक्त के नमूनों की जाच कर शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे।

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