कन्नौज
बसपा ने अपने शासनकाल में जिस कन्नौज को जिला का दर्जा देकर एक नई पहचान दी, उसी कन्नौज में उसे वह कामयाबी नहीं मिल सकी, जैसी दूसरी पार्टियों को मिलती रही है। कभी कांग्रेस का गढ़ रहा इलाका बाद के दिनों में सोशलिस्ट पार्टियों के लिए मुफीद साबित हुआ। भाजपा ने भी यहां अपनी पकड़ बनाई। 90 के दशक के बाद यहां सपा का दबदबा हुआ, लेकिन बसपा को उस तरह की कामयाबी नहीं मिल सकी।
इत्र और इतिहास की नगरी कन्नौज में कमोबेश सभी प्रमुख पार्टियों ने जीत का जश्न मनाया है। सूबे में कई बार सरकार बना चुकी बहूजन समाज पार्टी को कन्नौज में वह कामयाबी नहीं मिली है, जितना दूसरी पार्टियों को मिलती रही है। जब पिछली बार 2007 में बसपा पूर्ण बहूमत के साथ सूबे की सत्ता पर काबिज हुई थी, तब सिर्फ उसी चुनाव में यहां की तीनों सीट पर उसने अच्छी लड़ाई लड़ी, लेकिन जीत सिर्फ तिर्वा सीट पर ही हो सकी। उसके पहले और उसके बाद जिले की किसी भी सीट पर बसपा जीत के लिए जतन कर रही है। पिछले कई चुनाव में बसपा ने अलग-अलग सीटों पर टक्कर जरूर दी है, लेकिन उसे जीत में नहीं बदल सकी है। इस बार फिर से बसपा ने चुनाव में कामयाबी के लिए अपने सिपाहसालारों को मैदान में उतार दिया है। नतीजा बेहतर आए इसके लिए इस बार चेहरे भी नए सामने लाए गए हैं। अब बसपा का यह प्रयोग और उसका जतन किस तरह से कामयाबी हासिल कर सकता है, इसका फैसला तो यहां के वोटर ही करेंगे।

