पीएम मोदी और बीजेपी किसानों के सामने झुकने और कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा करने के लिए हुए मजबूर
700 से अधिक किसानों की मौत के लिए नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार जिम्मेदार
नई दिल्ली
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व अहंकारी भाजपा सरकार को हार स्वीकार करने और तीन किसान विरोधी, जन विरोधी और कॉर्पोरेट समर्थक कानूनों को निरस्त करने की घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा है । अखिल भारतीय किसान सभा भारत भर में उन लाखों किसानों, कृषि कामगारों और कामगारों को बधाई देता है जिन्होंने इन अधिनियमों के खिलाफ, अत्यधिक दमन के बावजूद एक वर्ष से अधिक समय तक दृढ़ संघर्ष का नेतृत्व किया है और इस ऐतिहासिक जीत के लिए महान बलिदान किया है। भारत की जनता ने इस संघर्ष में किसानों पर विश्वास जताया और समर्थन में बड़े पैमाने पर सामने आए।
हालांकि, इस ऐतिहासिक किसान संघर्ष की अन्य मूलभूत मांग- सभी किसानों की सभी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), उत्पादन की वास्तविक लागत (सी2+50%) के आधार पर, की गारंटी देने के लिए एक केंद्रीय अधिनियम अभी भी पूरा नहीं हुआ है। इस मांग को पूरा करने में नाकामी ने भारत में कृषि संकट को बढ़ा दिया है और पिछले 25 वर्षों में 4 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है, जिनमें से मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा शासन काल के पिछले 7 वर्षों में करीब 1 लाख किसानों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार किसानों के संघर्ष के पिछले एक साल के दौरान लगभग 700 लोगों के मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं ।अखिल भारतीय किसान सभा की मांग है कि प्रधानमंत्री और भाजपा सरकार को अपनी असंवेदनशील और हठी नीतियों के कारण सैकड़ों लोगों के मौत की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए । संयुक्त किसान आंदोलन के हाथों नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए यह दूसरी हार है। इससे पहले उन्हें किसानों के नेतृत्व में एकजुट विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर रोक लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा था । प्रधानमंत्री की यह घोषणा कृषि को निगमित करने और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने के प्रयास के खिलाफ बड़ी जीत है । अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) इस संयुक्त संघर्ष के शहीदों को सलाम करता है और हमारी सभी मांगें पूरी होने तक संघर्ष जारी रखने की प्रतिज्ञा करता है ।
भाजपा सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए अत्यधिक दमन किया और किसानों के विरोध को बदनाम करने के लिए कॉर्पोरेट मीडिया का इस्तेमाल किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने स्वयं किसानों के विरोध का नेतृत्व करने वालों को ' आंदोलनजीवि' का नाम दिया । भाजपा के कई अन्य नेताओं ने भी किसानों का अपमान किया है। उन्होंने किसानों के संघर्ष को राष्ट्र विरोधी बताते हुए उसे बदनाम करने का पूरा प्रयास किया। इस जीत से ऐसे तमाम हमले धाराशाही हुए हैं। लेकिन ये तय है की भारत के किसान उनके दमन, उनके ऊपर हुए क्रूर हमलों, हमारे साथियों की हत्या और किसानों के अपमान को कभी नहीं भूलेंगे । हम कंक्रीट की दीवारों, कंटीले तारों और बैरिकेड, खोदी गई खाइयों, रास्ते में लगाए गए किलों , तरह तरह के अपमान, अश्रुगैस, इंटरनेट पर बंदी, पत्रकारों पर हमले आदि दमन के विभिन्न अनुभवों को नहीं भूलेंगे । सब कुछ याद रखा जाएगा।
प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद भी हमें सतर्क रहना होगा और संसद से अधिनियमों के निरस्त होने की प्रतीक्षा करनी होगी । यदि प्रधानमंत्री यह मानते हैं कि उनकी घोषणा से किसानों के संघर्ष का अंत हो जाएगा तो वह भुलावे में हैं । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य या (MSP) लागू करने के लिए अधिनियम पारित नहीं हो जाता, बिजली संशोधन विधेयक और श्रम संहिताएं वापस नहीं ले ली जाती। यह तब तक जारी रहेगा जब तक लखीमपुर खीरी और करनाल के हत्यारों को सजा नहीं दिलाई जाती। यह जीत कई और संयुक्त संघर्षों को आगे बढ़ाएगी और हम नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रतिरोध का निर्माण करते हुए किसान विरोधी एवं मजदूर कर्मचारी विरोधी भाजपा को कई और पराजय देंगे।

