भोपाल
मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान मेनिट में तीन इमारतों के निर्माण का विवाद एक बार फिर गरमा गया है। मेनिट ने बारह करोड़ के निर्माण कार्य करने वाली एजेंसी से दान के रूप में छोड़ने को कहा है। इसकी एवज में मेनिट अपने भवनों को एजेंसी के परिजनों के नाम जीवनभर के लिये करने को तैयार है।
सरकारी संस्थानों में कोई कार्य कराने पर राशि निकालने में एजेंसी को महिनों और सालों लग जाते हैं। अब मेनिट ने नया दौर शुरू किया है। अब बकाया राशि को दान कराने का रास्ता खोज निकाला है। सात साल पहले टेंडर से तीन इमारतें तैयार करने का कार्य साहेब इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया। 48 करोड़ के निर्माण में से आठ करोड़ रुपए का भुगतान बाकी रखा गया है। निर्माण कार्य पूर्ण होने तक मेनिट नये डायरेक्टर की नियुक्ति होने पर भुगतान में अड़ंगे लगाना शुरू कर दिया। भुगतान से बचने कंपनी और अपने अफसरों की सांठगांठ की आशंका तक जता दी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शिकायत मिलने पर जांच कराई गई। मामला सीबीआई तक पहुंचा। जहां संस्थान द्वारा एक कंसल्टेंट नियुक्त कर उसे लगभग 40 लाख रुपये देकर अपने स्तर पर भी परीक्षण कराया गया, जिसका रिजल्ट शून्य रहा।
दान को राष्ट्रहित से जोडा
निर्माण कंपनी ने भी अदालत की शरण ली। जहां से आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया गया। कोर्ट ने भी कंपनी का पक्ष सही माना है। मेनिट के वरिष्ठ अफसरों द्वारा निर्माण के दौरान कमीशन मांगने पर पूरा मामला बिगड़ा था। घटनाक्रम के बाद मेनिट प्रबंधन ने मामले को सुलझाने पत्र लिखकर उक्त इमारतों को कंपनी अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर हमेशा के लिये करने तैयार है। मेनिट ने इसके जरिये राष्ट्रहित में राशि की बचत आदि का तर्क भी दिया है। मेनिट डायरेक्टर रघुवंशी इस प्रस्ताव को कल होने वाली बीओजी की बैठक में रखेगा। जहां करीब एक दर्जन मुद्दों पर और निर्णय लिये जाएंगे।
क्या कहती है कंपनी
कंपनी डायरेक्टर हर्ष मल्होत्रा का कहना है कि हमने मेनिट को ऐसा कोई प्रस्ताव दिया ही नहीं है। बल्कि इस पूरे विवाद के दौरान प्रबंधन ने हमसे मिलने-बैठक से भी मना कर दिया। कोर्ट ने भी हमारे पक्ष में फैसला दिया है और मानसिक रूप से प्रताडना पर भी साढे सात लाख का हजार्ना देने का आदेश दिया है। कंपनी का मानना है कि उसकी लंबित राशि ब्याज आदि मिलाकर अब बारह करोड़ हो गई है।
निदेशक से साधी चुप्पी
मेनिट निदेशक रघुवंशी ने उक्त प्रकरण में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है। 2016 कि तत्कालीन निदेशक नरेंद्र चौधरी के बाद नरेंद्र रघुवंशी को नियुक्त किया गया था। चौधरी के बाद रघुवंशी ने भुगतान रोकना शुरू किया लेकिन विभिन्न कमेटी (बीडब्ल्यूसी, एफसी), बोर्ड आॅफ गवर्नर आदि में इन्हीं इमारतों के निर्माण कार्य के नाम पर लगभग 22 करोड़ रुपये स्वीकृत करवा लिए गए जो कि जांच का विषय है 2016 से अत्यंत आधुनिक लाइब्रेरी बिल्डिंग बन कर तैयार है। इस बीच लगभग 6 छात्रों के बैच इसे उपयोग करने का सपना देखते हुए संस्थान से विदा हो गये। इस पर कैग (सीएजी) ने भी कड़ी आपत्ति जतायी है। इस भ्रष्टाचार से मेनिट को होने वाली आर्थिक क्षति के लिए जिम्मेदारी तय की जाना महत्वपूर्ण निर्णय होगा।

