Saturday, December 3

80 फीसदी से अधिक भारतीय जोखिम में, देश के 463 जिलों में जलवायु खतरा चरम पर पहुंचा

80 फीसदी से अधिक भारतीय जोखिम में, देश के 463 जिलों में जलवायु खतरा चरम पर पहुंचा


 नई दिल्ली 
देश में असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी जलवायु संबंधी चरम घटनाओं के लिए सबसे ज्यादा जोखिम वाले राज्य हैं। यह बात क्लाइमेट वल्नेरेबिलिटी इंडेक्स में सामने आई है, जिसे बुधवार को काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने जारी किया है। इतना ही नहीं 80 प्रतिशत से अधिक भारतीय जलवायु संबंधी चरम घटनाओं के जोखिम वाले जिलों में रहते हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि भारत के 640 जिलों में से 463 जिले अत्यधिक बाढ़, सूखे और चक्रवात के जोखिम के दायरे में हैं। इनमें से 45 प्रतिशत से अधिक जिले अस्थिर परिदृश्य और बुनियादी ढांचे में बदलावों का सामना कर चुके हैं। इसके अलावा, 183 हॉटस्पॉट (सबसे ज्यादा घटनाओं वाले) जिले जलवायु संबंधी एक से अधिक चरम घटनाओं के लिए अत्यधिक जोखिम की चपेट में हैं। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में यह भी पाया गया है कि 60 प्रतिशत से अधिक जिलों में मध्यम से निम्न स्तर तक की अनुकूलन क्षमता मौजूद है। असम में धेमाजी और नागांव, तेलंगाना में खम्मम, ओडिशा में गजपति, आंध्र प्रदेश में विजयनगरम, महाराष्ट्र में सांगली और तमिलनाडु में चेन्नई, भारत के सबसे ज्यादा जोखिम वाले जिलों में शामिल हैं। अध्ययन के अनुसार पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए बाढ़, मध्य और दक्षिण भारत के राज्यों के लिए भीषण सूखे का जोखिम सबसे ज्यादा है। इसके अलावा पूर्वी और दक्षिणी राज्यों के कुल जिलों में क्रमश: 59 और 41 प्रतिशत जिले भीषण चक्रवातों के जोखिम की चपेट में हैं।
 
63 प्रतिशत जिलों के पास प्रबंधन योजना
अध्ययन में कहा गया है कि केवल 63 प्रतिशत जिलों के पास ही जिला आपदा प्रबंधन योजना (डीडीएमपी) उपलब्ध है। लेकिन इन योजनाओं को प्रति वर्ष अद्यतन बनाने (अपडेट करने) की जरूरत होती है, इस लिहाज से 2019 तक इनमें से सिर्फ 32 प्रतिशत जिलों ने ही अपनी योजनाएं अपडेट की थी। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिशा, कर्नाटक, और गुजरात जैसे ज्यादा जोखिम वाले राज्यों ने हाल के वर्षों में अपने डीडीएमपी और जलवायु परिवर्तन-रोधी मुख्य बुनियादी ढांचों में सुधार किया है।

भारत को अन्य देशों के साथ साझेदारी करनी चाहिए
सीईईडब्ल्यू के सीईओ डा. अरुणाभा घोष ने कहा कि लगातार और बड़े पैमाने पर होने वाली जलवायु संबंधी चरम घटनाओं के खिलाफ संघर्ष भारत जैसे विकासशील देशों को आर्थिक रूप से कमजोर बनाने वाला है। इसलिए कॉप-26 में, विकसित देशों को 2009 से अटके 100 अरब डॉलर की मदद के वादे को पूरा करके भरोसे को दोबारा जीतना चाहिए और आने वाले दशकों में क्लाइमेट फाइनांस को बढ़ाने का वादा भी करना चाहिए। इसके अलावा, भारत को एक ग्लोबल रिजिलियंस रिजर्व फंड बनाने के लिए अन्य देशों के साथ साझेदारी करनी चाहिए, जो जलवायु संबंधी खतरों के खिलाफ बीमा का काम कर सकता है। यह फंड जलवायु परिवर्तन के लिहाज से सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों, खास तौर पर ग्लोबल साउथ (लैटिन अमेरिकी, एशिया, अफ्रीका, और ओशियानिया) के ऊपर से आर्थिक दबाव को घटाएगा।

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