Friday, April 12

मुंबई हमले में 100 से अधिक लोगों का प्राणरक्षक ‘चाय वाला’ अब दुकान बचाने के लिए कर रहा संघर्ष

मुंबई हमले में 100 से अधिक लोगों का प्राणरक्षक ‘चाय वाला’ अब दुकान बचाने के लिए कर रहा संघर्ष


मुजफ्फरपुर
मुंबई पर आतंकी कहर बरपा रहे थे। छत्रपति शिवाजी स्टेशन के आसपास लाशों की ढेर से दहशत फैल चुकी थी। पूरा भारत टीवी पर मुंबई में मची तबाही को देख रहा था। 13 साल पहले 26 नवम्बर की उस रात मुंबई में कई घटनाएं एक साथ हुईं। आंतकी मासूमों का खून बहा रहे थे तो वहीं कुछ लोग अपनी बहादुरी से लोगों की जान बचा रहे थे। सेना और सुरक्षाकर्मियों का हिस्सा नहीं होते हुए भी ये भारतीय असली हीरो की भूमिका में थे। ऐसा ही एक हीरो कटरा के डुमरी गांव का तौफीक थे जिसने मौत की परवाह नहीं करते हुए सौ से अधिक की जिन्दगी बचाई। तौफीक उर्फ छोटू चाय वाला। 13 साल पहले अपने गांव से मुंबई पहुंचे तौफीक की यही पहचान थी। स्टेशन से बिल्कुल सटी चाय की दुकान और रेलवे के साहबों को चाय पहुंचाने वाला छोटू। आज पहचान बदल चुकी है। दर्जनों सम्मान मिला और अब स्टेशन ही नहीं मुंबई प्रशासन से लेकर बड़ी-बड़ी संस्थाएं 26/11 के हीरो के नाम से तौफीक को जानते हैं और बुलाते हैं। एक तरफ तौफीक की कहानी पर हिन्दी फिल्म बन रही है तो दूसरी तरफ मुंबई का हीरो अब स्टेशन पर अपनी चाय दुकान बचाने को भी संघर्षरत है। अतिक्रमण बता पुलिस दुकान हटा देती है मगर फिर किसी की मेहरबानी से दुकान अभी भी वही हैं।

लाशें गिरनी शुरू हुई तो यात्रियों को पीछे के रास्ते से निकाला बाहर :
हिन्दुस्तान से बातचीत में तौफीक ने कहा कि आज भी वह मंजर आंखों के सामने हैं। कैसे भूल सकता हूं। 13 साल बाद भी आज लोग उसी वाकये को लेकर सम्मानित करने के लिए बुलाते हैं। 50 से अधिक सम्मान मिल चुका है। इस बार भी कई लोगों ने इंटरव्यू लिया और कई जगह सम्मान के लिए बुलाया गया है। आज भी उसी वीटी स्टेशन के बाहर चाय की दुकान है। हांलांकि कई बार वहां से उजाड़ा भी गया..यह कहते हुए तौफिक की आवाज भर्रा जाती है। तौफिक कहते हैं कि उस दिन भी चाय का पैसा लेने के लिए गया था। भीड़ बहुत थी तो मास्टर लोग बोले कि 10 मिनट बाद आना। मैं स्टेशन से सटे मेडिकल दुकान के बाहर खड़ा हो गया तभी लगा कि पटाखा छूट रहा है। मैंने सोचा कि इंडिया-इंगलैंड का मैच है, शायद उसी में पटाखे फूट रहे हैं। आवाज बढ़ती गई। तब तक मुझे समझ में आ गया कि ये पटाखे नहीं हैं। बचपन से रहा हूं, इसलिए मुझे सभी रास्ते पता थे। काउंटर के अंदर गया और दरवाजा बंद कर मैं चिल्लाने लगा कि टिकट छोड़ो और भागो, बम फूट रहा है। जो मर गए थे, उन्हें छोड़ दिया मगर जिन्दा लोगों को पीछे के रास्ते से बाहर करना शुरू किया। 2-3 मिनट बीता कि देखता हूं कि सामने से काउंटर रूम का दरवाजा तोड़ एक आदमी घुसा। मैंने चिल्लाते हुए कहा कि बचाने शायद कमांडो आए हैं, यह सुनते ही उसने गाली देते हुए गोली चला दी। वह कसाब था। कई लोग जैसे-तैसे बचे। बाद में ठेला गाड़ी से कई घायलों को अस्पताल पहुंचाया।

क्राइम ब्रांच ने गवाही और पहचान के लिए था बुलाया
तौफीक बताते हैं कि क्राइम ब्रांच मुम्बई ने मुझे गवाही और पहचान के लिए बुलाया। तीन-चार घंटे पूछा। तौफिक कहते हैं कि उस समय यही लगा कि बस मुझे किसी तरह लोगों की जान बचानी है। तब से आज तक ना जाने कितने संस्थाओं ने सम्मानित किया। उस समय रेलवे वालों ने घोषणा कि चाय वाले बहादुर छोटू को नौकरी मिलेगी मगर आज भी चाय ही बेच रहा हूं। लॉकडाउन में कर्जदार हो गया। अभी भी उसी मेहनत के बल पर आगे बढ़ रहा। गांव में रह रहे तौफिक के अब्बू मो. कलाम और रिश्तेदार कहते हैं बेटे की बहादुरी पर गर्व है।

 

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