Thursday, July 25

पार्टी में फिर पॉलिटिक्स का शिकार हुए कैलाश! जीत के बादशाह को क्यों मिली मुश्किल सीटें ?

पार्टी में फिर पॉलिटिक्स का शिकार हुए कैलाश! जीत के बादशाह को क्यों मिली मुश्किल सीटें ?


भोपाल. मध्यप्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक अपना लोहा मनवाने वाले बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय एक बार फिर पार्टी पॉलिटिक्स का शिकार होते नजर आ रहे हैं। प्रदेश में जल्द ही 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। करो या मरो के इस उपचुनाव में एक-एक सीट जीतने के लिए कड़ी मशक्कत शुरु हो गई है। ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों ने एमपी समेत पूरे देश में कद्दावर नेता के रुप में स्थापित हो चुके कैलाश विजयवर्गीय को मालवांचल की केवल पांच सीटों तक समेट कर रख दिया।

ये सीटें भी इतनी आसान नहीं हैं क्योंकि इनका मिजाज कभी भी एकतरफा नहीं रहा। इन पांचों सीटों पर ज्यादातर चुनावों में या तो कांग्रेस का कब्जा रहा या फिर ये कभी बीजेपी और कभी कांग्रेस के खाते में गईं। ऐसे में उपचुनाव में इन सीटों पर जीत हासिल करना इतना आसान नहीं है। तो सवाल है कि कैलाश विजयवर्गीय जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेता को सिर्फ पांच सीटों तक सीमित रखकर क्या उनके बढ़ते कद को कम करने की कोशिश की गई है ? इतना ही नहीं सवाल ये भी है कि इन पांच कांग्रेस फेवर की मुश्किल सीटों को जिताने की जिम्मेवारी ही कैलाश को क्यों सौंपी गई ? कहीं इसके पीछे मंशा ये तो नहीं कि अगर इन सीटों पर कैलाश जीत नहीं दिला पाए तो यकीनन हाईकमान के सामने कैलाश विजयवर्गीय के नंबर कम हो जाएंगे। और अगर जीत मिल भी गई तो इसका सेहरा प्रदेश अध्यक्ष और सीएम के सिर बंधेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि कैलाश को इस तरह अंडरएस्टीमेट करना पार्टी की मुश्किलें बढ़ा सकता है।

आईए आपको बताते हैं कि ये कौनसी 5 सीटें है जिनकी जिम्मेदारी कैलाश विजयवर्गीय को सौंपी गई है…

 1. हाटपिपल्या – इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी का कब्जा रहा लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के मनोज चौधरी चुनाव जीते थे जो सिंधिया के साथ ही बीजेपी में शामिल हो गए। ऐसे में सिंधिया मनोज चौधरी को ही उपचुनाव में टिकट दिलाने पर अड़ गए। इससे नाराज दीपक जोशी ने भी रास्ते खुले होने की बात कह दी थी। हालांकि बाद में वो मान गए लेकिन इस सीट पर बीजेपी को भीतरघात की आशंका है। मनोज या दीपक दोनों में कोई भी प्रत्याशी बने बीजेपी के लिए ये सीट जीतना आसान नहीं होगा।

 

 

2. बदनावर – इस सीट पर 2008 में जहां कांग्रेस के राज्यवर्धन दत्तीगांव चुनाव जीते तो 2013 में बीजेपी भंवरसिंह शेखावत ने सीट हथियाई। लेकिन 2018 में एक बार फिर राज्यवर्धन चुनाव जीत गए। अब दत्तीगांव भी सिंधिया की नाव में सवार होकर बीजेपी में आ चुके हैं लिहाजा इस सीट पर बीजेपी कार्यकर्ताओं का समर्थन मिल पाना इतना आसान नहीं।

3. आगर – इस सीट पर बीजेपी 6 बार जीत जरुर दर्ज कर चुकी है लेकिन मनोहर उंटवाल के निधन से यहां भी बीजेपी का गणित गड़बड़ा गया है। पिछले चुनाव में उंटवाल भी महल 2490 वोटों से जीत हासिल कर पाए थे ऐसे में कांग्रेस एक बार फिर अपने युवा चेहरे विपिन वानखेड़े को मैदान में उतार सकती है तो बीजेपी को चेहरे की तलाश रहेगी।

4. सांवेर – इस सीट पर सबकी निगाहें हैं क्योंकि एक तरफ मंत्री तुलसी सिलावट रहेंगे तो दूसरी तरफ कांग्रेस से प्रेमचंद गुड्डू का चुनाव लड़ना लगभग तय है। इस सीट का मिजाज भी हर चुनाव में बदलता रहा ऐसे में पार्टी के लिए यहां सबसे ज्यादा मुश्किल है।

5. सुवासरा – इस सीट पर दो चुनाव से कांग्रेस का कब्जा रहा। मंदसौर जिले की एकमात्र सीट कांग्रेस को दिलाने वाले हरदीप डंग अब बीजेपी में आ चुके हैं और पिछला चुनाव भी वो महज 350 वोटों से जीत पाए थे ऐसे में मतदाता के सामने भी संकट होगा कि वो इस बार वो हरदीप डंग को किस आधार पर चुनेगी।

 

 

तो इन सीटों का विश्लेषण करने से साफ जाहिर है कि कैलाश को ऐसी जिम्मेदारी दी गई है, जिसे पूरा करने पर उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि न तो वे मंत्री बन पाएंगे न उनके पुत्र। और अगर वे जीत नहीं दिला पाए तो हार का ठीकरा जरुर उनके ही सिर फूटना है और इसका व्यक्तिगत नुकसान भी उन्हें झेलना पड़ सकता है। ऐसे में लगता है कि बंगाल में पार्टी को शून्य से 22 सीटों तक पहुंचाने वाले कैलाश विजयवर्गीय कहीं अपने ही घर में अपनों की ही सियासत का शिकार न बन जाएं।

EDIT BY : DIPESH JAIN

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