Friday, February 3

समता व सदभाव क़ो स्थापित करेगा

समता व सदभाव क़ो स्थापित करेगा


महू
 ’जिन’ का अर्थ है जीतने वाला जिसने आंतरिक दोष, राग-द्वेष को जीत लिया और ’जिन’ का अनुयायी ही जैन है। राग-द्वेष से ही अन्य सभी दोष जीवन में आते हैं। पहले तीर्थंकर ऋषभ देव आदि पृथ्वीनाथ के रुप में हैं, हेमचंन्द्रकार जिसका उल्लेख किया है, वे आदि देव हैं जिन्होंने ब्राह्मी लिपि, लेखन, अनेक ग्रंथों, पाण्डूलिपियां, संगीत शास्त्र एवं अनेक विद्याएं प्रदान किया हैं। उन्होंने प्रश्न उठाते हुए कहा कि भारत देश का नाम किसके नाम से प्रसिद्ध हुआ? भगवान ऋषभ देव के पुत्र भरत, दुष्यंत के पुत्र भरत, और भगवान राम के भाई भरत के रुप में जिनका उल्लेख है, जिसमें सर्वाधिक प्राचीन ऋषभ देव के पुत्र भरत है। उक्त विचार प्रो. जितेन्द्र बाबूलाल शाह , नव नियुक्त मानद प्रोफ़ेसर एवं एल.डी. इंस्टीट्यूट आफ इंडोलाॅजी, अहमदाबाद के पूर्व निदेशक ने “जैन दर्शन का उद्भव एवं विकास“ विषय पर विशेष व्याख्यान के अवसर पर कहे। उन्होंने कहा कि जैन परम्पराओं में 25 लाख से अधिक हस्तप्रद/पाण्डुलिपियां संग्रहित हैं, जिनके संरक्षण की परम्परा भी अति प्राचीन है। इससे पूर्व डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने विश्वविद्यालय में जैन दर्शन शोध पीठ का उद्घाटन करते हुए कहा कि जैन परम्परा अति प्राचीन है उसका तत्वज्ञान और मूल्य परम्परा प्रेरणादायी रही है। समस्त धर्मों में मानवता का धर्म श्रेष्ठ है हमें मानव की शांति, प्रेम और करुणा के लिए कार्य करना चााहिए। विश्वविद्यालय ने इन्हीं उद्देश्यों से जैन दर्शन शोध पीठ की स्थापना की है। उन्होंने कहा कि इस पीठ के द्वारा जैन धर्म की समतामूलक और सद्भावकारी अवधारणाओं को विवि के सभी शोध अध्ययन केंद्रों से समाज तक ले जाने का कार्य जैन दर्शन शोध पीठ करेगा।

पीठ के सह-समन्वयक डाॅ. बिंदिया तातेड़ ने कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन किया। प्रो. डी.के. वर्मा, ने स्वागत उद्बोधन एवं बीज वक्ता का परिचय देते हुए कहा कि जैन धर्म सर्वोपरी है जिसमें अंहिसा, प्राणी दया जैसे भाव है। पीठ के समन्वयक प्रो. सुरेन्द्र पाठक ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि जैन और सनातन परम्परा समानान्तर चलती रही है और भारतीय संस्कृति की आधारभूत अवधारणाएं इनमें मिलती हैं। ब्राउस के कुलसचिव श्री अजय वर्मा, प्रो. देवनाथ देवाषीष, प्रो. शेलेन्द्रमणि त्रिपाठी, डाॅ. मनीषा सक्सेना, डाॅ. नवरत्न बोथरा  का  आयोजन में सहयोग रहा। 150 से अधिक प्रतिभागियों ने इस वेब व्याख्यान में भाग लिया।

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